“लाख समस्याओं का एक समाधान – सनातन”

इस वामपंथ लेख श्रृंखला में  हमने वामपंथियों और उनकी रणनीतियों के बारे में जाना।

आज जानेंगे कि इस राक्षसी प्रवृत्ति के लोगों से बचने का तोड़ क्या है –

अगर मैं आप सबसे सीधे शब्दों में  कहूं कि इन लोगों का तोड़ एक ही है वो है –

 “सनातन” संस्कृति को अपने जीवन आचरण में लाना। तो आप क्या कहेंगे???

शायद आप थोड़ा चौंक जाएंगे!! या फिर शायद न भी चौंके….. पर सत्य तो यही है……

 तो आज हम साम्यवाद (communism) और सनातन के बीच एक तुलनात्मक अध्ययन करेंगे और आखिर तक मैं इस बात को पूरा समझाने का प्रयास करूंगा कि कैसे हम सबका अपने “सनातन मूल्यों” का अभ्यास करना हमारे देश को वामपंथियों  की हिंसा की विचारधारा (leftists’s ideology of violence) से मुक्त कर सकता है।

अगर “साम्यवादियों” ( communists)  के सिध्दांतों की बात की जाए  तो चाहे वो –

*सीमाओं के उन्मूलन की विचार हो।

*राज्य या राष्ट्र अवधारणा को समाप्त करना या फिर अराजकता के समर्थन का सिध्दांत हो।

*एक वर्गविहीन (categoryless) समाज की स्थापना का विचार हो जिसमें जाति या वर्ग न हो सिर्फ मानवता की ही बात हो।

*धन और संपत्ति का वितरण आवाश्यकतानुसार हो और समाज के ही द्वारा हो, कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत संपदा न रखे।

अब यहां पर अगर इन सब सिध्दांतों पर गौर किया जाये तो आप पायेंगे कि इनमें कुछ ग़लत नहीं है बल्कि बातें तो बड़ी ही अच्छी कही गईं हैं और इनसे निर्धन – ग़रीब, वंचित – शोषित प्रभावित भी जल्दी हो सकते हैं।

लेकिन इन सब सिध्दांतों को लागू करने का मूल भाव होना चाहिए था “प्रेम और करूणा” ।

और इन सब सिध्दांतों का अनुसरण तो बिना सत्ता में रहे भी किया जा सकता था, इसमें सत्ता प्राप्ति की कोई आवश्यकता नहीं थी।

यहीं सबसे “महाभयंकर भूल” इन वामपंथियों (leftists) ने कर दी।

साम्यवादी सिध्दांतों (communism) को लागू करवाने के लिए इन्होंने प्रेम और करूणा की बजाय “हिंसा का मार्ग” (path of voilence) अपनाया और वर्तमान तंत्र (current system) को उखाड़ फेंक “साम्यवादी शासन” (communist rule) स्थापित करने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए “हिंसा का मार्ग” अपनाया।

यहीं इनका मानवतावादी होने का दावा ही समाप्त हो गया।

इसका कारण सिर्फ इतना ही है कि जब कोई भी व्यक्ति अपनी विचारधारा (ideology) या उन सिद्धांतों (principles) जिनको वो अपने जीवन के आचरण हेतु सबसे आदर्श मानता है। उन सिद्धांतों के बारे में यह मानने लगे कि “सिर्फ यही विचारधारा सर्वश्रेष्ठ है” और इतनी श्रेष्ठ (superior) है कि समाज को इसका अनुसरण कराने के लिए हिंसा का मार्ग भी अपनाया जा सकता है तब यह एक उन्माद (frenzy), एक पागलपन में बदल जाता है।

बिल्कुल यही स्थिति “जिहादियों और आतंकवादियों” की है  क्योंकि उनका भी यही मानना है कि हमारा मज़हब  इतना अधिक श्रेष्ठ (superior) है कि विश्व के सभी लोगों को इस मज़हब का अनुयायी बनाने के लिए हिंसा भी करनी पड़े तो भी उसमें कोई ग़लत बात नहीं है क्योंकि हम हिंसा ही विश्व के सर्वश्रेष्ठ ध्येय की सिध्दि (fruition of the best motto) के लिए ही कर रहे हैं और इस तरह वो अपनी हिंसा को न्यायसंगत (justified) बताते हैं।

और यही हाल इन वामपंथियों का भी है इनको भी अपना ध्येय सर्वश्रेष्ठ मालूम पड़ता है जिससे ये भी हिंसा करते आ रहे हैं और हर मंच से हिंसा की न्यायसंगतता सिध्द करते हैं इसीलिए यह दोनों अब साथ हो लिए हैं।

यह पागलपन काफी समय से चला  आ रहा है।

एक मज़हब के मानने वाले कट्टरपंथियों ने भी और साम्यवादी विचारधारा (communism) को मानने वाले लोगों ने अपने शांतिपूर्ण मज़हब और विचारधारा को प्रसारित करने या फैलाने के लिए प्रेम और करूणा नहीं बल्कि “हिंसा” (voilence) का मार्ग अपनाया।

शांति का मज़हब फैलाने के लिए अशांति का सहारा लिया गया।

और मानवतावाद (humanism) की बात करने वाले साम्यवादियों (communism) ने अपने तंत्र को लागू करने के लिए  “अमानवीयता”(inhumanity) का मार्ग अपनाया।

अब आते हैं उस बात पर कैसे सनातन मूल्यों के बल से हम इन “हिंसक राक्षसों” को हरा सकते हैं।

उदाहरण के लिए मान लीजिए कि “आप एक समुद्र के किनारे बैठे हैं और समुद्र क्षेत्र पर आपका पूर्ण अधिकार है, आप सारा समुद्र घूम सकते हैं उसमें स्नान कर सकते हैं  यानि कि समुद्र भी आपका और समुद्र तट भी आपका…..

अगर मैं वहां आकर आपसे कहूं कि ज़रा मेरे साथ आइये मैं आपको पानी से भरा एक छोटा सा तालाब या छोटी सी नदी दिखाना चाहता हूं तो आप क्या कहेंगे???

आपकी तो हंसी निकल पड़ेगी…..

आप कहेंगे कि जिसके पास पूरा का पूरा समुद्र उपलब्ध है वो छोटे मोटे नदी – तालाबों के पीछे क्यों भागेगा???

अब इसी चीज़ को इस तरह समझिए कि वह समुद्र है हमारी “सनातन संस्कृति और उसका शाश्वत ज्ञान” और वह गांव का छोटा सा तालाब या नदी है साम्यवाद।

आपको शायद थोड़ा गुस्सा आ रहा होगा कि ये आदमी “साम्यवाद” (communism) और सनातन की बात एक साथ कैसे कर रहा है क्योंकि आपको पिछले लेखों में जो वामपंथ (left wing) के बारे में जो जानकारी मिली उससे तो आपको अब “वामपंथ” शब्द ही एक गाली लगने लगा होगा, यही होता है मित्रों जब कोई भी सिध्दांत, चाहे वो कितना ही उच्च कोटि का क्यों न हो, कोई भी मज़हब, चाहे कितनी भी “शांति” की बातें क्यों न करता हो अगर हिंसा के द्वारा अपने सिध्दांत थोपेगा तो गाली ही बनकर रह जायेगा।

हिंसा से कभी शांति और मानवता नहीं फैलती।

अब सनातन‌ वो समुद्र कैसे हुआ ये समझते हैं –

*कम्युनिज्म धन का वितरण समाज के हाथ में होना चाहिए ऐसी बात कहता है….

और सनातन इस बारे में क्या कहता है सुनिए….

सनातन कहता है  –

“शतहस्त समाहर सहस्त्र हस्त संकिर” –

 अर्थात् “सौ हाथों से कमाओ और हज़ार हाथों से दान करो”

*(अथर्ववेद 3/24/5)

अगर इस सीख को हम अपने जीवन में अनुसरण करें।

तो धन किसी के भी पास रहे उस व्यक्ति तक पहुंच ही जायेगा जिसको धन की आवश्यकता है।

और यह बात लागू तो सबके लिए  लागू होती है लेकिन धनवानों को तो स्वेच्छा से ही यह बात माननी चाहिए।

इससे पूरे राष्ट्र में कोई वंचित न रहेगा।

**साम्यवाद कहता है कि सीमाओं का उन्मूलन अर्थात् देशों की सीमाएं (borders of the nations) समाप्त कर देनी चाहिए और समाज वर्गविहीन हो, सिर्फ मानवता की बात हो।

जबकि सनातन इस विचार को और बेहतर तरीके से करूणापूर्वक कहता है।

“अयं निज: प्रो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्।।

*(महोपनिषद्, अध्याय ४(4), श्‍लोक ७१(71))

अर्थात् यह अपना बंधु है यह अपना बंधु नहीं है ऐसी छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वालों के लिए तो पूरी धरती ही परिवार है।

अब अगर यह बात जीवन में हम उतार लें तो हमारे मन की सीमाएं तो वैसे ही समाप्त हो गईं फिर भौतिक सीमाएं (physical borders) का मूल्य ही नहीं रह जायेगा, जब सभी अपना ही परिवार हैं तो क्या आस्ट्रेलिया और क्या जापान??? राष्ट्र और वर्गों में बंटे समाज  की अवधारणा तो ऐसे ही समाप्त हो गई।

और सबसे बड़ी बात यह है कि यह सब बातें सनातन प्रेम और करुणा के द्वारा प्रसारित करने की बात करता है न कि हिंसा के द्वारा।

सनातन में दान की तो कई जिस की ही गई है साथ ही पुरुषार्थ और स्वाबलंबन की बात भी कही गई है ताकि लोग आलस्यपूर्ण और अकर्मण्य (निकम्मे) न हो जायें।

ताकि लोगों की इस दान वृत्ति का दुरुपयोग न हो।

अब जब किसी भी व्यक्ति के पास पूरा “समुद्र” ही उपलब्ध हो तो वो छोटे मोटे नदी तालाबों से क्या प्रभावित होगा और सनातन का अर्थ ही है जो अनंत है, और अंतिम गंतव्य (final destination) है सबसे अच्छी बात यह है कि मतभेदों के लिए भी जगह है, बदलाव के लिए हम हमेशा तैयार रहते हैं हर सदी में “ब्रह्मसूत्र” पर एक टीका लिखते हैं, अगर कोई मतभेद हो तो “शास्त्रार्थ” की व्यवस्था है, यहां तक कि  ईश्वर में नहीं मानोगे तो “नास्तिक” होने की भी सुविधा है,

नास्तिक हो फिर भी हिंदू हो।

ये जो मैंने यहां बताया ये तो सनातन समुद्र की एक बूंद भी न थी,‌ अभी तो पूरा समुद्र नापना है।

अब अगर आपको यह सब अपने जीवन में उतारना कठिन लगता है तो एक बात मैं आपसे कह दूं कि समुद्र की सैर करने की बात करोगे तो समुद्री तूफान भी आपके हिस्से आयेंगे लेकिन विश्वास मानिए कि इस “सनातनी समुद्र” की यात्रा ही  इतनी आनन्द दायक होगी कि तूफान बहुत छोटे मालूम पड़ेंगे।

ये तो हुई बड़े स्तर पर इनसे निपटने की बात…..

ये बिल्कुल ही अंतिम समाधान था…

अब सनातन से निकले समाधान तो अंतिम और स्थायी ही होंगे न।

आगे और भी कुछ कहना है कि हम छोटे छोटे और क्या क्या प्रयास कर सकते हैं कि जिससे हम बाहरी स्तर पर इनसे निपट सकें। 🙏🙏🙏🙏

तब तक के लिए

हर हर महादेव 🙏🙏🙏🙏

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